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मध्ययुगीन समाज : वैश्विक परिप्रेक्ष्य UNIT 2 CHAPTER 4 SEMESTER 2 THEORY NOTES इस्लामी दुनिया में सांस्कृतिक पैटर्न HISTORY DU. SOL.DU NEP COURSES

मध्ययुगीन समाज : वैश्विक परिप्रेक्ष्य UNIT 2 CHAPTER 4 SEMESTER 2 THEORY NOTES इस्लामी दुनिया में सांस्कृतिक पैटर्न HISTORY DU. SOL.DU NEP COURSES


 सांस्कृतिक पैटर्न: अदब, अखलाक़ और सूफीवाद 

 अदब 

अदब इस्लामी सभ्यता का सुसंस्कृत और महानगरीय पहलू था, जो दरबारों और शहरी केंद्रों में विकसित हुआ। यह साहित्य, कला और जीवन के परिष्कृत तरीके का प्रतीक था। 9वीं शताब्दी तक अदब ने शास्त्रीय रूप ले लिया और पूरे मुस्लिम जगत में इसे अपनाया गया।

1. अदब का उद्भव और विकास

अदब की शुरुआत इस्लामी दरबारों में हुई, जहाँ सैन्य शक्ति के साथ सांस्कृतिक परिष्कार को भी महत्व दिया गया। 9वीं शताब्दी तक यह परंपरा शास्त्रीय रूप में स्थापित हुई, जिसने साहित्य, स्थापत्य और कला के नए मानक बनाए।

2. अदब की विशेषताएँ

  • अरबी साहित्य: अदब का मुख्य आधार, विशेषकर शायरी, जो दरबारों में अत्यधिक सम्मानित थी।
  • साहित्यिक कौशल: एक अदीब को इतिहास, भूगोल, दर्शन और शिष्टाचार में पारंगत होना चाहिए।
  • गद्य और पद्य: दोनों में उत्कृष्टता अदब की पहचान थी।

3. महत्वपूर्ण लेखक और कवि

  • इमरु-अल कैस: प्राचीन अरब कवि, जिन्हें पैगंबर मोहम्मद ने सराहा।
  • अबू तम्मम और अल मुतनब्बी: नए साहित्यिक मानकों को स्थापित करने वाले कवि।
  • अम्र-अल जाहिज: अपने सरल और रोचक गद्य से अदब को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

4. अदब और कला का प्रभाव

अदब साहित्य के साथ-साथ स्थापत्य, कपड़ा बुनाई, मिट्टी के बर्तन और आभूषण निर्माण जैसी कलाओं में भी व्यक्त हुआ। यह जीवन के हर पहलू में सांस्कृतिक परिष्कार लाने का माध्यम बना।

5. अदब की सांस्कृतिक महत्ता

अदब ने पारंपरिक अरब और फारसी परंपराओं को आधुनिकता के साथ जोड़ा। इसने मुस्लिम समाज को सुसंस्कृत जीवन और साहित्यिक उत्कृष्टता की दिशा में प्रेरित किया और सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध किया।


 अख़लाक़ 

अख़लाक़ का अर्थ है नैतिकता और अच्छे आचरण, जो इस्लामी जीवन के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। कुरान और हदीस में नैतिकता पर जोर इस बात का प्रतीक है कि इस्लाम इसे मानवता के निर्माण और समाज की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक मानता है।

1. अख़लाक़ की विशेषताएँ

  • ईमानदारी और सच्चाई: मुसलमानों से ईमानदारी और सच्चाई से युक्त आचरण की अपेक्षा की जाती है।
  • सब्र (धैर्य): प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य और ईश्वर में विश्वास।
  • उदारता: गरीबों और कमजोरों की मदद को एक पवित्र जिम्मेदारी माना गया।
  • पारिवारिक जीवन: पारंपरिक पितृसत्तात्मक ढांचे में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित करते हुए विवाह की स्थिरता पर जोर दिया गया।

2. इस्लामी नैतिकता का विकास

  • इस्लाम ने पारंपरिक अरब नैतिकता को भाईचारे और अधिकार की नई अवधारणाओं से जोड़ा।
  • युद्ध में बेडौइन साहस को अनुशासित बलिदान में बदला।
  • कबीले के स्थान पर उम्मा (इस्लामी समुदाय) को प्राथमिकता दी गई।
  • पारंपरिक गुणों को आत्म-नियंत्रण (हिल्म) और तर्कसंगत निर्णय (अक्ल) के आधार पर फिर से परिभाषित किया।

3. कुरान और नैतिकता

कुरान ने न केवल धार्मिक अनुष्ठानों बल्कि सामाजिक और कानूनी दायित्वों को भी स्पष्ट किया।

  • बुनियादी सिद्धांत: विश्वास, प्रार्थना, उपवास, दान और तीर्थयात्रा।
  • सामाजिक नियम: विवाह, तलाक, विरासत, और व्यावसायिक मामलों के नियम।
  • आध्यात्मिक गुण: ईश्वर के प्रति आभार, पश्चाताप, ईमानदारी, और अंतिम न्याय का भय।

4. मुहम्मद और नैतिकता

पैगंबर मुहम्मद ने नैतिकता के उच्च मानदंड स्थापित किए, जो रोजमर्रा के जीवन, राजनीति, और युद्ध की नैतिकता में परिलक्षित होते थे। उनके आदर्श मुसलमानों के लिए पवित्र जीवन और योद्धा-संत के रूप में प्रेरणा का स्रोत बने।


 सूफीवाद 

सूफीवाद इस्लाम की एक तपस्वी और रहस्यमय परंपरा है, जिसकी शुरुआत 7वीं शताब्दी में हुई और 8वीं शताब्दी तक यह एक संगठित धार्मिक आंदोलन बन गया। सूफीवाद का उद्देश्य ईश्वर के साथ एक व्यक्तिगत और प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करना था।

  • सूफीवाद की उत्पत्ति और सिद्धांत: सूफीवाद की पहचान ऊनी वस्त्र (सूफ) पहनने से होती थी। सूफियों ने इस्लामी न्यायशास्त्र से अलग जीवन शैली अपनाई, जिसमें कुरान पाठ और ध्यान केंद्रित थे। वे सामुदायिक केंद्रों (खानकाह) में रहते हुए तपस्या और भक्ति में लीन रहते थे।
  • चरण और आध्यात्मिक सिद्धांत: सूफियों ने आत्मा की यात्रा के लिए विभिन्न चरणों को निर्धारित किया, जिन्हें मक़ाम कहा जाता है। प्रमुख चरण थे - सब्र (धैर्य), शुक्र (कृतज्ञता), तवक्कुल (ईश्वर में पूर्ण विश्वास), रिदा (संतोष) और फना (आत्मा का ईश्वर में विलीन होना)। ये चरण आंशिक रूप से व्यक्तिगत प्रयास और ईश्वर की कृपा से प्राप्त किए जा सकते थे।
  • सूफी रहस्यवाद और दर्शन: सूफीवाद में ईश्वर के विभिन्न नामों का पाठ और ध्यान महत्वपूर्ण था। सूफी संतों (औलिया) को ईश्वर और मनुष्य के बीच वार्ताकार माना गया, जिनमें चमत्कार करने की शक्ति थी। वे ब्रह्मांड और आत्मा के स्थान को समझने के लिए गहन बौद्धिक प्रयास करते थे।
  • सूफीवाद की परंपराएँ और विभाजन: सूफीवाद में खुरासानी और बगदादी दो प्रमुख झुकाव थे। खुरासानी झुकाव में तवक्कुल, रिदा, और गरीबी की शपथ पर जोर था, जबकि बगदादी झुकाव में धैर्य, विश्वास और ईश्वर के प्रति प्रेम को बढ़ावा दिया गया और यह कुरान तथा इस्लामी न्यायशास्त्र के करीब था।
  • सूफीवाद का प्रभाव: सूफी संतों और उनकी चमत्कारी शक्तियों ने जनता में गहरी पैठ बनाई। सूफीवाद ने ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण के माध्यम से समाज में नैतिक और आध्यात्मिक सुधार लाए। यह आंदोलन 7वीं शताब्दी में व्यक्तिगत मुक्ति की तलाश के रूप में शुरू हुआ और 10वीं शताब्दी तक व्यापक धार्मिक आंदोलन बन गया।


 शहरीकरण और व्यापार 

आठवीं और नौवीं शताब्दी में इस्लाम के राजनीतिक विस्तार ने व्यापक शहरीकरण और व्यापार को बढ़ावा दिया। बाइजेंटाइन और ससानियन साम्राज्यों के पूर्व क्षेत्रों को इस्लामी साम्राज्य में शामिल करने से लंबी दूरी के व्यापार को मजबूती मिली।

  • गैरीसन शहर और शहरी विस्तार: खलीफा शासकों ने सीमांत क्षेत्रों में गैरीसन कस्बों (अमसर) की स्थापना की, जैसे बसरा, कूफ़ा और फुस्तात। बगदाद (762 ई.) इस्लामिक दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण शहरी केंद्र बन गया। इन शहरी केंद्रों ने अरब और गैर-अरब संस्कृतियों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया, जिससे अरबी-फारसी संस्कृति का विकास हुआ।
  • प्रमुख शहरी केंद्र और निर्माण: प्रमुख शहरों में निशापुर, मारव, इस्फ़हान और हमदान शामिल थे। इन शहरों में महलों, मस्जिदों, उद्यानों, नहरों और चौकियों का निर्माण हुआ, जो सांस्कृतिक संपर्क और प्रशासनिक प्रगति के प्रतीक बने।
  • व्यापार और आर्थिक विकास: व्यापार और वाणिज्य के कारण मुस्लिम शहरी मध्यम वर्ग का उदय हुआ, जो शहरों की राजनीतिक और आर्थिक गतिविधियों में प्रमुख भूमिका निभाता था। हालांकि, इन शहरी केंद्रों का नियंत्रण शासक वर्ग के पास था, जिससे पूंजीवाद का विकास सीमित रहा।
  • शहरीकरण का प्रभाव: शहरी केंद्र व्यापार, सैन्य और प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र बने। इन शहरों ने सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन को प्रेरित किया और इस्लामी सभ्यता की पहचान को मजबूत किया।


 इस्लामी कला और वास्तुकला 

इस्लामी कला और वास्तुकला में फारसी और बाइजेंटाइन कला के प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। बाइजेंटाइन से गुंबद, मेहराब और स्तंभ जैसे तत्व लिए गए थे, जबकि फारसी कला ने जटिल और सजावटी रूपों को समृद्ध किया।

  • वास्तुकला की विशेषताएँ: इस्लामी वास्तुकला में प्रमुख संरचनाओं में मस्जिद, महल, स्कूल, पुस्तकालय, निजी आवास और अस्पताल शामिल थे। डिजाइन तत्वों में बल्बनुमा, विशाल और भव्य गुंबद, ऊँची मीनारें, घोड़े की नाल के आकार के मेहराब, और पत्थर की जाली, काले और सफेद मोज़ाइक का इस्तेमाल प्रमुख था। अरबी लिपि की पट्टियाँ भी सजावट में शामिल थीं। बाइजेंटाइन शैली के मुकाबले बाहरी अलंकरण न्यूनतम था।
  • कला की अन्य विशेषताएँ: इस्लामी कला में कालीन और ब्रोकेड सिल्क की बुनाई, टेपेस्ट्री, जटिल धातु के काम, "एनामेल्ड ग्लासवेयर" और चित्रित मिट्टी के बर्तन शामिल थे। कला में शुद्ध दृश्य डिजाइन पर ध्यान दिया गया, जो अमूर्त और गैर-प्रतिनिधित्वात्मक था, ताकि यह धार्मिक प्रतिबंधों के अनुरूप हो सके।
  • धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष कला: इस्लामी कला ने धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष दोनों रूपों में योगदान किया। मस्जिदों के साथ-साथ महल और अन्य संरचनाएँ भी वास्तुकला का हिस्सा थीं। चित्रकला और मूर्तिकला में मानवीय रूपों के चित्रण पर इस्लामी पूर्वाग्रह के कारण प्रतिबंध रहा।
  • महत्व: इस्लामी कला ने दृश्य डिजाइन और सजावट को प्राथमिकता दी, जो इसे धार्मिक शिक्षाओं की सीमाओं से मुक्त रखता था। इसने फारसी, बाइजेंटाइन और अन्य सांस्कृतिक तत्वों को समाहित करते हुए एक अद्वितीय शैली विकसित की। इस्लामी कला और वास्तुकला ने दुनिया को अपनी जटिलता, सुंदरता और सांस्कृतिक समृद्धि से प्रभावित किया, और यह इस्लामी सभ्यता की पहचान का अभिन्न हिस्सा बन गई।



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