B.A. FIRST YEAR हिंदी सिनेमा का अध्ययन UNIT 3 CHAPTER 2 सिनेमा में निर्देशक एवं निर्देशन का कार्य सेंसर बोर्ड और सिनेमा प्रसारण अधिनियम NOTES


निर्देशक

निर्देशक सिनेमा का जनक होता है वह फिल्म के निर्माण की पूरी प्रक्रिया को तैयार करता है कहानी पटकथा गीत संगीत नृत्य संवाद तथा कलाकारों का चयन सबकी भूमिका निर्देशक ही तय करता है निर्देशक जितना दूरदर्शी होगा फिल्म भी उतनी ही प्रभावशाली होगी निर्देशक वही अच्छा होगा जो तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ समाज शास्त्र और इतिहास का संपूर्ण ज्ञान रखता है

श्याम बेनेगल फिल्म (समर)

श्याम बेनेगल समांतर और लोकप्रिय सिनेमा के बहुत चर्चित फिल्मकार है श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित समर फिल्म जातिवाद व्यवस्था कि मानसिकता पर गहरा प्रहार करती है समर भारत के मध्य प्रदेश के सागर जिले के कुल्लू गांव की कहानी है गांव में फैली अव्यवस्था और आडंबर की पोल खोलती समर फिल्म दलित समाज के आक्रोश और गुस्से को नए ढंग से प्रस्तुत करती है इनकी फिल्में भारतीय समाज में फैले जातिवाद धार्मिक आडंबर ब्राह्मणवाद और दलितों के साथ हो रही अमानवीयता को उजागर करती हैं

ब्लैक फ्राईडे (अनुराग कश्यप)

हिंदी सिनेमा में आतंक हिंसा और दंगों पर आधारित फिल्में बनती रही है और निर्देशकों ने इन विषयों को सुलझाने का प्रयास किया है अपनी फिल्मों के माध्यम से अनुराग कश्यप द्वारा निर्देशित ब्लैक फ्राईडे फिल्म की कहानी 6 दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोट और सांप्रदायिक दंगों पर आधारित है पूरी फिल्म में अनुराग कश्यप ने जिस तरह से काम किया है वह उनके निर्देशन के व्यक्तित्व की खास पहचान है

गुजारिश ( संजय लीला भंसाली )

संजय लीला भंसाली हिंदी सिनेमा के संभावनाशील निर्देशक है वह जीवन की छोटी-छोटी सच्चाई है को पर्दे पर दिखाते हैं खामोशी, हम दिल दे चुके सनम, सांवरिया, ब्लैक जैसी फिल्में बनाने वाले संजय की फिल्म गुजारिश भी हिंदी सिनेमा के पर्दे पर जीवन और मृत्यु का उत्सव रचती है भारत जैसे पारंपरिक देश में इच्छामृत्यु जैसे गंभीर मुद्दे को पर्दे पर दिखाने का साहस करना ही बड़ी बात है गुजारिश फिल्मी यही दिखाया गया है

फिल्म सेंसर बोर्ड और सिनेमा प्रसारण अधिनियम

सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन की स्थापना 15 जनवरी 1952 को मुंबई में हुई फिल्म सेंसर बोर्ड द्वारा भारत में बनने वाली फिल्मों धारावाहिको की समीक्षा करती है यह भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करता है फिल्मों धारावाहिकों आदि को प्रमाण पत्र वितरित करने का अधिकार सेंसर बोर्ड को सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952 (अधिनियम 37) का आधार दिया गया है

केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड की फिल्मों के लिए 4 श्रेणियां हैं

U - इन फिल्मों को सभी आयु वर्ग के व्यक्ति देख सकते हैं U/A - इस श्रेणी की फिल्मों के कुछ दृश्यों में हिंसा अश्लील भाषा या यौन संबंधित सामग्री हो सकती है इस श्रेणी की फिल्में केवल 12 साल से बड़े व्यक्ति किसी अभिभावक की उपस्थिति में ही देख सकते हैं A - यह वह श्रेणी है जिसके लिए सिर्फ व्यस्क यानी 18 साल या उससे अधिक उम्र वाले व्यक्ति ही देख सकते हैं S - यह विशेष श्रेणी है यह उन फिल्मों को दी जाती है जो विशिष्ट दर्शकों जैसे इंजीनियर या डॉक्टर आदि के लिए बनाई जाती हैं

चलचित्र अधिनियम 1952 में संशोधन को मंजूरी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चलचित्र अधिनियम 1952 में संशोधन के लिए चलचित्र संशोधन विधेयक 2019 को प्रस्तुत करने की मंजूरी दी इस संशोधन का प्रस्ताव सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा किया गया प्रस्ताव विधेयक का उद्देश्य फिल्म की साहित्यिक चोरी पायरेसी को रोकना है इसमें गैर अधिकृत केमकोडिंग और फिल्मों की कॉपी बनाने के खिलाफ दंडात्मक प्रावधानों को शामिल किया गया है 

चलचित्र अधिनियम 1952 की धारा 6A के बाद एक और धारा बनी 6AA जिसमें लेखक की लिखित अनुमति के बिना किसी ऑडियो विजुअल रिकॉर्डिंग उपकरण का उपयोग करके किसी फिल्म या उसके हिस्से को प्रसारित करने या प्रसारित करने का प्रयास करने में सहायता पहुंचाने की अनुमति नहीं होगी यदि कोई व्यक्ति धारा 6AAके प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो उसे 3 साल तक का कारावास और ₹1000000 का जुर्माना दोनों सजा दी जा सकती है

संशोधन की आवश्यकता

डिजिटल तकनीकी आगमन से विशेष रूप से इंटरनेट पर पायरेटेड फिल्मों के प्रदर्शन से पायरेसी का खतरा बढ़ चुका था इससे फिल्म उद्योग और सरकार को राजस्व के अत्यधिक हानि होती फिल्म उद्योग की लंबे समय से मांग थी कि सरकार केमकॉर्डिंग और पायरेसी रोकने के लिए कानून में संशोधन करेंइससे पहले चलचित्र अधिनियम और नियमों की समीक्षा करने के लिए सिफारिशें देने के लिए 2013 में मुद्गल समिति तथा वर्ष 2016 में श्याम बेनेगल समिति का गठन किया गया था



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